RBSE Class 10th Social Science Important Questions Chapter-6

Chapter-6 केंद्र सरकार

प्रश्न 1.प्रधानमंत्री को कौन नियुक्त करता है?


उत्तर:
राष्ट्रपति

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प्रश्न 2.राष्ट्रपति का चुनाव किस पद्धति के आधार पर होता है?
उत्तर: एकल संक्रमणीय मत पद्धति

प्रश्न 3.राज्यसभा का पदेन सभापति कौन होता है?
उत्तर:उपराष्ट्रपति

प्रश्न 4.केंद्रीय मंत्रिमण्डल की अध्यक्षता कौन करता है?
उत्तर:प्रधानमंत्री

प्रश्न 5.संसद के सत्रावसान में राष्ट्रपति विशेष परिस्थितियों में जो आदेश जारी करता है, उसे क्या कहते हैं?
उत्तर:अध्यादेश

प्रश्न 6.किस बात के संबंध में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों को प्रारंभिक क्षेत्राधिकार प्राप्त हैं?


उत्तर:मौलिक अधिकारों के संबंध में

प्रश्न 7.कम से कम कितने समय तक उच्चतम न्यायालम में वकालत कर चुके भारतीय नागरिक को उच्चतम न्यायलय में । न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकता है?
उत्तर:10 वर्ष

प्रश्न 8.एक बार नियुक्त हो जाने पर उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश कितने वर्ष की आयु तक अपने पद पर रह सकता
उत्तर:65 वर्ष की आयु तक

प्रश्न 9.‘अभिलेख न्यायालय’ का आशय क्या है?
उत्तर:अनुच्छेद 129 सर्वोच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय का स्थान प्रदान करती है। अभिलेख न्यायालय के दो आशय हैं–प्रथम इस न्यायालय के निर्णय सब जगह साक्ष्य के रूप में स्वीकार किये जाएँगे और इन्हें किसी भी न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने पर उनकी प्रामाणिकता के द्वारा न्यायालय अवमानना के लिए किसी भी प्रकार का दंड दिया जा सकता है।

प्रश्न 10.उच्चतम न्यायालय को एक ‘अभिलेख न्यायालय’ (Court of Record) क्यों कहा जाता है?



उत्तर:उच्चतम न्यायालय को अभिलेख न्यायालय इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस न्यायालय के निर्णय सब जगह साक्ष्य के रूप में स्वीकार किए जाएँगे और इन्हें किसी भी न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने पर उनकी प्रामणिकता के विषय में प्रश्न नहीं उठाया जाएगा। दूसरा इस न्यायालय के द्वारा ‘न्यायालय अवमानना’ के लिए किसी भी प्रकार का दण्ड दिया जा सकता है।

प्रश्न 11.उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश किसके द्वारा और कैसे हटाये जा सकते हैं?
उत्तर:साधारणतया सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर आसीन रह सकते हैं। सिद्ध कदाचार अथवा असमर्थता के कारण संसद के द्वारा न्यायाधीश को उसके पद से हटाया जा सकता है। यदि संसद के दोनों सदन अलग-अलग अपने कुल सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से इसको अयोग्य या आपत्तिजनक आचरण करने वाला प्रमाणित कर देते हैं तो भारत के राष्ट्रपति के आदेश से उस न्यायाधीश को अपने पद से हटना होगी।

प्रश्न 12.‘न्यायिक पुनर्विलोकन’ का महत्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:अनुच्छेद 131 और अनुच्छेद 132 सर्वोच्च न्यायालय का संघीय तथा राज्य सरकारों द्वारा निर्मित विधियों के पुनर्विलोकन का अधिकार देता है। यदि संघीय संसद् या राज्य विधानमंडल संविधान का अतिक्रमण करते हैं या मौलिक अधिकारों के विरुद्ध विधि का निर्माण करते हैं तो संघीय संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा निर्मित ऐसी विधि को सर्वोच्च न्यायालय अवैधानिक घोषित कर सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय की इस शक्ति को न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति कहा जाता है। सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति के कारण कोई भी केंद्र और राज्य सरकार असंवैधानिक कानूनों का निर्माण नहीं कर सकता और न ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन कर सकता है।

प्रश्न 13.उच्चतम न्यायालय को एक ‘अभिलेख न्यायालय’ (Court of Record) क्यों कहा जाता है?


उत्तर:उच्चतम न्यायालय को अभिलेख न्यायालय इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस न्यायालय के निर्णय सब जगह साक्ष्य के रूप में स्वीकार किए जाएँगे और इन्हें किसी भी न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने पर उनकी प्रामणिकता के विषय में प्रश्न नहीं उठाया जाएगा। दूसरा इस न्यायालय के द्वारा ‘न्यायालय अवमानना’ के लिए किसी भी प्रकार का दण्ड दिया जा सकता है।

प्रश्न 14.उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश किसके द्वारा और कैसे हटाये जा सकते हैं?
उत्तर:साधारणतया सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर आसीन रह सकते हैं। सिद्ध कदाचार अथवा असमर्थता के कारण संसद के द्वारा न्यायाधीश को उसके पद से हटाया जा सकता है। यदि संसद के दोनों सदन अलग-अलग अपने कुल सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से इसको अयोग्य या आपत्तिजनक आचरण करने वाला प्रमाणित कर देते हैं तो भारत के राष्ट्रपति के आदेश से उस न्यायाधीश को अपने पद से हटना होगी।

प्रश्न 15.‘न्यायिक पुनर्विलोकन’ का महत्व स्पष्ट कीजिए।उत्तर:
अनुच्छेद 131 और अनुच्छेद 132 सर्वोच्च न्यायालय का संघीय तथा राज्य सरकारों द्वारा निर्मित विधियों के पुनर्विलोकन का अधिकार देता है। यदि संघीय संसद् या राज्य विधानमंडल संविधान का अतिक्रमण करते हैं या मौलिक अधिकारों के विरुद्ध विधि का निर्माण करते हैं तो संघीय संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा निर्मित ऐसी विधि को सर्वोच्च न्यायालय अवैधानिक घोषित कर सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय की इस शक्ति को न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति कहा जाता है। सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति के कारण कोई भी केंद्र और राज्य सरकार असंवैधानिक कानूनों का निर्माण नहीं कर सकता और न ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन कर सकता है।

प्रश्न 16.राष्ट्रपति की सामान्य काल में शक्तियों तथा अधिकारों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:राष्ट्रपति को सामान्य काल में निम्नलिखित शक्तियाँ तथा अधिकार प्राप्त हैं

(i) कार्यपालिका अथवा प्रशासनिक शक्तियाँ- संविधान के अनुच्छेद 53 के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी तथा वह उसका प्रयोग संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ पदाधिकारियों द्वारा करेगा। इस प्रकार शासन का समस्त कार्य राष्ट्रपति के नाम से होगा और सरकार के समस्त निर्णय उसके ही माने जाएँगे।

(क) महत्वपूर्ण अधिकारियों की नियुक्ति- राष्ट्रपति भारत संघ के अनेक महत्वपूर्ण अधिकारियों की नियुक्ति करता है; जैसे-प्रधानमंत्री की सलाह से अन्य मंत्री, राज्यों के राज्यपाल, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों, महालेखा परीक्षक, संघीय लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्य तथा विदेशों में राजदूत आदि।

(ख) सैनिक क्षेत्र में शक्ति- राष्ट्रपति भारत की समस्त सेनाओं का प्रधान सेनापति है, किंतु इस अधिकार का प्रयोग वह कानून के अनुसार ही कर सकता है। प्रतिरक्षा सेवाओं, युद्ध और शांति आदि के विषय में कानून बनाने की शक्ति केवल संसद को प्राप्त है। अतः भारतीय राष्ट्रपति संसद की स्वीकृति के बिना न तो युद्ध की घोषणा कर सकता है और न ही सेनाओं का प्रयोग कर सकता है।

(ii) विधायी शक्तियाँ- राष्ट्रपति को भारतीय संसद का अभिन्न अंग माना जाता है और इस रूप में राष्ट्रपति को विधायी क्षेत्र की विभिन्न शक्तियाँ प्राप्त हैं:

(क) विधायी क्षेत्र का प्रशासन- राष्ट्रपति संसद के अधिवेशन बुलाता है और अधिवेशन समाप्ति की घोषणा करता है।
वह प्रधानमंत्री की सिफारिश पर लोकसभा को उसके निश्चित काल से पूर्व भी भंग कर सकता है। अब तक 9 बार लोकसभा को समय से पूर्व भंग किया जा चुका है। संसद के अधिवेशन के प्रारंभ में राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में भाषण देता है। इसके द्वारा अन्य अवसरों पर भी संसद को संदेश या उनकी बैठकों में भाषण देने का कार्य किया जा सकता है।

(ख) सदस्यों को मनोनीत करने की शक्ति- राष्ट्रपति को राज्यसभा में 12 सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार है। जिनके द्वारा साहित्य, विज्ञान, कला या अन्य किसी क्षेत्र में विशेष सेवा की गयी हो। वह लोकसभा में 2 आंग्ल भारतीय सदस्यों को मनोनीत करते हैं।

(ग) अध्यादेश जारी करने की शक्ति- जिस समय संसद का अधिवेशन न हो रहा हो, उस समय राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने का अधिकार प्राप्त है। ये अध्यादेश संसद का अधिवेशन प्रारंभ होने के 6 सप्ताह बाद तक लागू रहेंगे लेकिन संसद चाहे तो उसके द्वारा जारी अध्यादेशों को अवधि से पूर्व भी समाप्त किया जा सकता है।

(iii) वित्तीय शक्तियाँ- राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारंभ में संसद के दोनों सदनों के सम्मुख भारत सरकार की | उस वर्ष के लिए आय और व्यय का विवरण रखवायेगा। उसकी आज्ञा के बिना धन विधेयक और अनुदान माँगे लोकसभा में प्रस्तावित नहीं की जा सकती।

(iv) न्यायिक शक्तियाँ- संविधान में न्यायपालिका की स्वतंत्रता के सिद्धांत को अपनाया गया है। यह उच्चतम तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है। उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्मित न्यायालय की कार्य व्यवस्था से संबंधित नियमों के संबंध में राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक है। राष्ट्रपति को एक अन्य महत्वपूर्ण शक्ति क्षमादान की प्राप्त है। राष्ट्रपति को न्यायिक शक्ति के अंतर्गत दंड प्राप्त व्यक्तियों को क्षमा प्रदान करने या दंड को कुछ समय के लिए स्थगित करने का अधिकार भी प्राप्त है।




प्रश्न 17.राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों की विवचना कीजिए।

उत्तर:संकट की स्थिति का सामना करने के लिए संविधान द्वारा राष्ट्रपति को विशेष शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। वर्तमान समय | में संविधान के संकटकालीन प्रावधानों की स्थिति निम्न प्रकार है

(i) युद्ध, बाहरी आक्रमण या आंतरिक अशांति की स्थिति से संबंधित संकटकालीन व्यवस्था- मूल संविधान के अनुच्छेद 352 में व्यवस्था है कि यदि राष्ट्रपति को समाधान हो जाए कि युद्ध, बाहरी आक्रमण या आंतरिक अशांति के कारण भारत या उसके किसी भाग की शांति व्यवस्था नष्ट होने का भय है तो यथार्थ रूप से इस प्रकार की परिस्थिति उत्पन्न होने पर या इस प्रकार की परिस्थिति उत्पन्न होने की आशंका होने पर राष्ट्रपति संकटकालीन व्यवस्था की घोषणा कर सकता है। संसद की स्वीकृति हो जाने पर शासन इसे जब तक लागू रखना चाहे रख सकता है। 44वें संवैधानिक संशोधन के बाद वर्तमान समय में इस संबंध में व्यवस्था निम्न प्रकार है

प्रथम- अब इस प्रकार की आपातकाल, युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह अथवा इस प्रकार की आशंका होने पर ही घोषित किया जा सकेगा। केवल आंतरिक अशांति के नाम पर आपातकाल घोषित नहीं किया जा सकता।
द्वितीय- राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आपातकाल की घोषणा तभी की जा सकेगी जबकि मंत्रिमंडल लिखित रूप में राष्ट्रपति को ऐसा परामर्श दे।
तृतीय- घोषणा के एक माह के अंदर संसद के विशेष बहुमत (दो तिहाई बहुमत) से इसकी स्वीकृति आवश्यक होगी और इसे लागू रखने के लिए प्रति 6 माह बाद स्वीकृति आवश्यक होगी।
चतुर्थ- लोकसभा में उपस्थित एवं मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत से आपातकाल की घोषणा समाप्त की जा सकती है।

(ii) राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफल होने से उत्पन्न संकटकालीन व्यवस्था- अनुच्छेद 356 के अनुसार राष्ट्रपति को राज्यपाल के प्रतिवेदन पर या अन्य किसी प्रकार से यकीन हो जाय कि ऐसी परिस्थिति पैदा हो गई है कि राज्य का शासन संविधान के उपबन्धों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है तो वह उस राज्य के लिए संकटकाल की घोषणा कर सकता है। संसद की स्वीकृति के बिना यह घोषणा दो माह से अधिक की अवधि के लिए लागू नहीं रहेगी। संसद के द्वारा एक प्रस्ताव पास कर राज्य में 6 माह के लिए राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है। इस प्रकार के प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग अपने साधारण बहुमत से पास किया जाना आवश्यक है। किसी भी परिस्थिति में तीन वर्ष के बाद राष्ट्रपति शासन लागू नहीं रखा जा सकेगा।


(iii) वित्तीय संकट- अनुच्छेद 360 के अनुसार जब राष्ट्रपति को यह विश्वास हो जाय कि ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गयी हैं जिनसे भारत के वित्तीय स्थायित्व यो साख को खतरा है तो वह वित्तीय संकट की घोषणा कर सकता है। ऐसी घोषणा के लिए भी वही अवधि निर्धारित है जो प्रथम प्रकार की घोषणा के लिए है।

प्रश्न 18.मंत्रिमंडल के गठन एवं उसकी शक्तियों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:मूल संविधान के अनुच्छेद 74 में उपबंधित है कि राष्ट्रपति को उसके कार्यों के संपादन में सहायता एवं परामर्श देने के लिए मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा।

मंत्रिमंडल का गठन

(i) प्रधानमंत्री की नियुक्ति- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75 के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होगी तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री के परामर्श से की जाएगी। संविधान के अनुसार राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है।

(ii) प्रधानमंत्री द्वारा मंत्रियों का चयन- अन्य मंत्रियों की नियुक्ति के संबंध में संवैधानिक स्थिति यह है कि राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की राय से अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करेगा लेकिन व्यवहार में राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के परामर्श को मानने के लिए बाध्य है।

(iii) मंत्रियों की श्रेणियाँ- मंत्रियों की तीन श्रेणियाँ होती हैं। मंत्रिमंडल या कैबिनेट मंत्री, राज्यमंत्री तथा उपमंत्री। मंत्रिमंडल की शक्तियाँ-संविधान के अनुच्छेद 74 में कहा गया है कि मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति को उसके कार्यों के संपादन में सहायता और परामर्श देगी। व्यवहार में मंत्रिमंडल भारतीय शासन की सर्वोच्च इकाई है और उसके द्वारा समस्त .शासन व्यवस्था का संचालन किया जाता है।

(iv) राष्ट्रीय नीति निर्धारित करना- मंत्रिमंडल का महत्वपूर्ण कार्य राष्ट्रीय नीति निर्धारित करना है। मंत्रिमंडल यह निश्चित करता है कि आंतरिक क्षेत्र में प्रशासन के विभिन्न विभागों द्वारा और वैदेशिक क्षेत्र में दूसरे देशों के साथ संबंध के विषय में किस प्रकार की नीति अपनायी जाएगी।

(v) कानून निर्माण- संसदात्मक व्यवस्था होने के कारण मंत्रिमंडल का कार्य क्षेत्र नीति निर्धारण तक ही सीमित नहीं है वरन इसके द्वारा कानून निर्माण के कार्य का भी नेतृत्व किया जाता है। मंत्रिमंडल द्वारा नीति निर्धारित कर दिए जाने के बाद उसके द्वारा ही विधि निर्माण का कार्यक्रम निश्चित किया जाता है और मंत्रिमंडल के सदस्य ही महत्वपूर्ण विधेयक सदन में प्रस्तावित करते हैं।

(vi) कार्यपालिका पर नियंत्रण- सैद्धांतिक दृष्टि से संघ सरकार की समस्त कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति के हाथों में है लेकिन ब्यवहार में इस प्रकार की समस्त कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग मंत्रिमंडल के द्वारा किया जाता है।

(vii) वित्तीय कार्य- मंत्रिमंडल द्वारा निर्धारित नीति के आधार पर ही वित्त मंत्री बजट तैयार करता है और वही उसे लोकसभा में प्रस्तुत करता है।

प्रश्न 19.उच्चतम न्यायालय के संगठन, क्षेत्राधिकार और शक्तियों का वर्णन कीजिए।



उत्तर:सर्वोच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय का गठन-सर्वोच्च न्यायालय के लिए एक मुख्य न्यायाधीश तथा सात अन्य न्यायाधीशों की व्यवस्था की गयी है और संविधान के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन या सेवा शर्ते निश्चित करने का अधिकार संसद को दिया गया है। 2008 में मुख्य न्यायाधीश सहित न्यायाधीशों की संख्या 31 कर दी गई। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत का राष्ट्रपति करता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश के संबंध में राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों से परामर्श लेता है

जिनसे वह इस संबंध में परामर्श लेना आवश्यक समझता है। वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलेजियम व्यवस्था से की जाती है। जिसके अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों का एक समूह राष्ट्रपति को नाम प्रस्तावित करते हैं व राष्ट्रपति इन्हीं नामों में से न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार वे शक्तियाँ भारतीय संविधान के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को बहुत अधिक व्यापक क्षेत्राधिकार प्रदान किया गया है जो कि निम्न है

(i) प्रारंभिक क्षेत्राधिकार- सर्वोच्च न्यायालय के प्रारंभिक क्षेत्राधिकार को दो भागों में बाँटा जा सकता है

(क) प्रारंभिक एकमेव क्षेत्राधिकार- प्रारंभिक एकमेव क्षेत्राधिकार का आशय उन विवादों से है जिनकी सुनवाई केवल भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ही की जा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय के प्रारंभिक एकमेव क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत निम्न विषय आते हैं। भारत सरकार, संघ का कोई राज्य या राज्यों तथा एक या अधिक राज्यों के बीच विवाद, दो या दो से अधिक राज्यों के बीच संवैधानिक विषयों के संबंध में उत्पन्न कोई विवाद, भारत सरकार तथा एक या एक से अधिक राज्यों के बीच विवाद।।
(ख) प्रारंभिक समवर्ती क्षेत्राधिकार- संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को लागू करने के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ उच्च न्यायालय को भी अधिकार प्रदान किया गया है। अत: मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित जो विवाद है, वे चाहे तो पहले किसी राज्य के उच्च न्यायालय में और चाहे तो सीधे सर्वोच्च न्यायालय में उपस्थित किए जा सकते हैं।

(ii) अपीलीय क्षेत्राधिकार- सर्वोच्च न्यायालय को संविधान ने अपीलीय क्षेत्राधिकार भी प्रदान किया है और यह भारत का अंतिम अपीलीय न्यायालय है। उसे समस्त राज्यों के उच्च न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार है। यदि उच्च न्यायालये यह प्रमाणित कर दें कि विवाद में संविधान की व्याख्या से संबंधित कानून का कोई महत्वपूर्ण प्रश्न निहित है तो उच्च न्यायालय के निर्णय की अपीले सर्वोच्च न्यायालय में भी की जा सकती है। इसके अतिरिक्त सभी दीवानी विवादों की अपील सर्वोच्च न्यायालय में की जा सकती है। फौजदारी के क्षेत्र में उन विवादों में उच्च न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है जिनमें

(क) उच्च न्यायालय ने नीचे के न्यायालय के ऐसे किसी निर्णय को रद्द करके अभियुक्त को मृत्युदंड दे दिया हो, जिसमें नीचे के न्यायालय ने अभियुक्त को अपराध मुक्त कर दिया था।
(ख) उच्च न्यायालय ने नीचे के न्यायालय में चल रहे किसी विवाद को अपने यहाँ लेकर अभियुक्त को मृत्युदंड दे दिया हो।
(ग) उच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर दे कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में अपील के योग्य है। कुछ ऐसे मामले हो सकते हैं जो उपर्युक्त श्रेणी में नहीं आते लेकिन जिनमें सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय को अधिकार दिया गया है कि सैनिक न्यायालय को छोड़कर वह भारत के अन्य किसी न्यायालय अथवा न्यायमंडल के निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की अनुमति प्रदान कर दें।


(iii) अपील के लिए विशेष आज्ञा देने का अधिकार- संविधान के अनुच्छेद 138 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय को स्वयं भी यह अधिकार प्राप्त है कि वह सैनिक न्यायालय को छोड़कर भारत राज्य क्षेत्र के किसी भी न्यायालय या न्यायाधिकरण के निर्णय के विरुद्ध अपने यहाँ अपील की अनुमति दे सकता है। उसकी इस शक्ति पर कोई संवैधानिक प्रतिबंध नहीं है।

(iv) परामर्श संबंधी क्षेत्राधिकार- संविधान ने सर्वोच्च न्यायालय को परामर्श संबंधी क्षेत्राधिकार प्रदान किया है। अनुच्छेद 143 के अनुसार यदि किसी समय राष्ट्रपति को प्रतीत हो कि विधि या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न पैदा हुआ है जो सार्वजनिक महत्व का है तो वह उस प्रश्न परे सर्वोच्च न्यायालय का परामर्श माँग सकता है। न्यायालय के परामर्श को स्वीकार या अस्वीकार करना राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर होगा।

(v) अभिलेख न्यायालय- अनुच्छेद 129 सर्वोच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय का स्थान प्रदान करता है। अभिलेख न्यायालय के दो आशय हैं प्रथम इस न्यायालय के निर्णय सब जगह साक्ष्य के रूप में स्वीकार किये जाएँगे और इन्हें किसी भी न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने पर उनकी प्रामाणिकता के विषय में प्रश्न नहीं उठाया जाएगा। द्वितीय इस न्यायालय के द्वारा अवमानना के लिए किसी भी प्रकार का दंड दिया जा सकता है।

प्रश्न 20.किन्हीं तीन ऐसी परिस्थितियों का उल्लेख कीजिए, जिससे किसी विधानसभा के सदस्य की सदस्यता का अंत हो जाता
उत्तर:विधानमंडल के दोनों सदनों की सदस्यता का अंत निम्न में से किसी भी परिस्थिति में हो जाता है|

कोई भी व्यक्ति यदि राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों का सदस्य निर्वाचित हो जाता है, तो उसे एक सदन से त्यागपत्र देना होगा। इसी प्रकार कोई भी व्यक्ति राज्य के विधानमंडल और संसद दोनों का एक साथ सदस्य नहीं रह सकता है।
कोई भी सदस्य यदि विधानमंडल के संबंधित सदन की बैठक में सदन की आज्ञा के बिना लगातार 60 दिन तक अनुपस्थित रहता है।
यदि किसी व्यक्ति के सदन का सदस्य हो चुकने के बाद उसमें सदस्यता के लिए निर्धारित योग्यता नहीं रह जाती है या उसमें कोई निर्धारित अयोग्यता पैदा हो जाती है।

प्रश्न 21.विधानसभा के अध्यक्ष के कार्यों को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:विधानसभा के अध्यक्ष के अधिकार तथा कार्य निम्न हैं

वह विधानसभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है और सदन की कार्यवाही का संचालन करता है।
सदन में शांति और व्यवस्था बनाए रखना उसका मुख्य उत्तरदायित्व है तथा इस हेतु उसे समस्त आवश्यक कार्यवाही करने का अधिकार है।
सदन का कोई सदस्य सदन में उसकी आज्ञा से ही भाषण दे सकता है।
वह सदन की कार्यवाही में ऐसे शब्दों को निकाले जाने का आदेश दे सकता है, जो असंसदीय या अशिष्ट हैं।
सदन के नेता के परामर्श से वह सदन की कार्यवाही का क्रम निश्चित कर सकता है।
वह प्रश्नों को स्वीकार करता है या नियम विरूद्ध होने पर उन्हें अस्वीकार करता है।
वह मतदान पश्चात परिणाम की घोषणा करता है।।
सामान्य परिस्थिति से वह सदन के मतदान में भाग नहीं लेता, लेकिन यदि किसी प्रश्न पर पक्ष और विपक्ष में बराबर मत आए तो वह निर्णायक मत का प्रयोग करता है।
कोई विधेयक धन विधेयक है अथवा नहीं, इसका निर्णय अध्यक्ष ही करता है।
दल-बदल संबंधी याचिकाओं पर निर्णय देता है। अध्यक्ष की अनुपस्थिति में इन सभी कार्यों का संपादन उपाध्यक्ष करता है।

प्रश्न 22.मान लीजिए आप विधानसभा के अध्यक्ष हैं और आपको सदन के सदस्यगण हटाना चाहते हैं। इसके लिए उन्हें जिस विधि का अनुसरण करना होगा, उसे संक्षेप में समझाइए।उत्तर:
अगर सदस्यगण विधानसभा के अध्यक्ष को उसके कार्यकाल से पहले हटाना चाहते हैं, तो अध्यक्ष को विधानसभा सदस्यों के बहुमत द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव के आधार पर हटाया जा सकता है, किंतु इस प्रकार के प्रस्ताव की सूचना 14 दिन पूर्व अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को देना आवश्यक है। अध्यक्ष को विधानसभा सदस्यों के बहुमत द्वारा हटाया जा सकता है। इसके बाद अध्यक्ष अपना त्यागपत्र उपाध्यक्ष को तथा उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र अध्यक्ष को दे सकता है।

प्रश्न 23.यदि राजस्थान में विधानपरिषद की स्थाना करनी हो, तो क्या विधि अपनानी होगी?



उत्तर:विधानसभा को विधानपरिषद की उत्पत्ति तथा समाप्ति के लिए संसद से सिफारिशें करने का अधिकार है। अनुच्छेद 169 के अनुसार यदि विधानसभा अपनी पूरी सदस्य संख्या के बहुमत से तथा उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या के दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित कर देती है तो संसद उस राज्य के लिए विधानपरिषद का सृजन | अथवा समाप्ति के लिए कानून बनाएगी।

प्रश्न 24.राज्यपाल पद के उम्मीदवार में कौन-सी योग्यताएँ आवश्यक हैं?



उत्तर:राज्यपाल के पद पर नियुक्ति के लिए दो योग्यताएँ होनी आवश्यक हैं। प्रथम वह भारत का नागरिक हो और द्वितीय, उसकी आयु 35 वर्ष से अधिक हो, राज्यपाल संसद अथवा राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं हो सकता है और यदि वह किसी सदन का सदस्य है तो राज्यपाल के पद पर नियुक्ति की तिथि से पहले उसे अपनी सदस्यता का त्याग करना होगा। राज्यपाल कोई लाभ का पद धारण नहीं कर सकता।

प्रश्न 25.राज्य मंत्रिपरिषद का गठन किस प्रकार होता है?
उत्तर:मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्य की मंत्रिपरिषद के गठन का प्रथम चरण है। अनुच्छेद 164 में कहा गया है कि राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करेगा और मुख्यमंत्री की सलाह से अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करेगा। इस संबंध में निश्चित परम्परा यह है कि राज्य की विधानसभा में बहुमत दल के नेता को राज्यपाल मुख्यमंत्री पद पर नियुक्ति करता है।

अन्य मंत्रियों का चयन मुख्यमंत्री ही करता है और वह मंत्रियों के नामों तथा उनके विभागों की सूची राज्यपाल को देता है। मंत्रिपरिषद का गठन करना मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार माना जाता है। मंत्रिपरिषद में कितने सदस्य हों, इसका निर्णय भी मुख्यमंत्री करता है। 91वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा मंत्रिपरिषद के आकार को विधानसभा सदस्य संख्या का 15 प्रतिशत तक सीमित कर दिया गया है।

 

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